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Friday, October 2, 2020

उन पैरों के निशां अभी बाकी हैं


 "रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम" गाने की आवाज जैसे ही कानों मे पड़ी, मैं जूरी से बोली, "लो डियर बज गए पांच! चल उठ, तैयार हो कर छ: बजे प्रार्थना स्थल पर पहुँचना है।

                      तैयार हो तम्बू में सामान पैक करते समय विचारों की लय में कब बह निकली पता ही नहीं चला...। दांडी यात्रा की 75 वीं वर्षगांठ पर उसी समय, उसी स्थान पर 78 यात्रियों के साथ पुन: दांडी यात्रा आयोजित की जा रही है। 78 यात्रियों के अलावा भी सेवा दल, स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़े लोग, बहुत से मीडिया इत्यादि लोगों का झुंड का झुंड चल रहा है। शहरों व गावों में लोगों द्वारा स्वागत देखते ही बनता है।

                      पर इस दांडी यात्रा और गाँधी की दांडी यात्रा में कुछ तो फर्क है? है न, उस समय हर व्यक्ति एक ही उद्देश्य से चल रहा था, ब्रिटिश साम्राज्य की तानाशाही का अंत। परन्तु, यहाँ कोई इस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा बनाना चाहता है, तो कोई एडवंचर करना चाहता है। कुछ तो ऐसे भी जो किसी राजनीतिक कारण से या सरकारी ड्यूटी की वजह से चल रहे हैं...।

"क्या सोच रही है? प्रार्थना की लाइन लग गई है। चल, प्रार्थना नहीं करवानी है तुझे?" जूरी की आवाज ने मेरी सोच की लय को भंग कर दिया।

                        प्रार्थना...और फ़िर से पदयात्रा शुरू...। रास्ते में चलते हुए एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर मुलाक़ात हो गई। बातचीत में सुबह-सुबह हमें रघुपति राघव के आलार्म से जगाने वाले शख्स की चर्चा चल पड़ी। "सच में कितने मन से सारा दिन लोगों की सेवा करता है।" मेरी बात सुनकर रिपोर्टर ने उस व्यक्ति से मिलने और उसका इंटरव्यू लेने की इच्छा जाहिर की। मुझे भी लगा कि उस व्यक्ति की निस्वार्थ सेवा सब के लिए प्रेरणा बन सकती है।

                     लैंच ब्रेक के स्थान पर पहुँचने के बाद मैं उस व्यक्ति कों ढूँढने निकल पड़ी। हर कोई भरी दोपहरी में सुस्ता कर अपनी थकान मिटा रहा था। तभी वो मुझे किसी के पाँव दबाता दिखाई पड़ा। मैं उसकी ओर बढ़ी।

"भइया जी, चलो टी.वी. वाले आपका इंटरव्यू लेना चाहते है।" मैंने उसे कहा। वो चुपचाप मेरे साथ चल पड़ा। "भाई रिपोर्टर महोदय कहाँ है?" न्यूज चैनल कि वैन पर पहुँच कर मैंने ड्राइवर से पूछा। "यहीं पास में ही गए हैं, आते ही होंगे।" ड्राइवर ने जवाब दिया। "अब इसे लायी हूँ तो बेचारे का इंटरव्यू करवा ही दिया जाए।" यह सोचकर मैं वहां खड़ी हो गई। 

                      थोड़ा वक्त बिताने पर वो मुझसे बोला, "मैडम मैं चलता हूँ, मेरा वक्त बरबाद हो रहा है।" मुझे बड़ा गुस्सा आया। अरे भई, यहाँ सुबह से लोगों में टी.वी. चैनल में शक्ल दिखाने की होड़ लगी रहती है। इसको चला कर मौका दिला रही हूँ , वो भी भरी दोपहरी में इसके साथ खड़े रहकर, तो इसको कदर ही नहीं है। मैंने पूछ ही लिया, "क्या भैया ऐसा कौन-सा महत्वपूर्ण काम चूक रहा है?" वो बोला, " मैडम इतनी देर में कई लोगों की सेवा कर लूँगा। आप इन्हें वहीं ले आना। मैं थके-मांदे लोगों के पैर भी दबाता रहूंगा और इन्हें जो पूछना होगा वो पूछ लेंगें। "

                       जैसे ही वो चलने को पलटा, मैंने उसे टोका, "क्या नाम है आपका?" वो ठिठक कर धीरे से बोला ''राजू''। "क्या करते हो?" मेरा अगला सवाल था। "मैडम, बेटे के साथ गांवों में घूमकर प्रेशर कुकर ठीक करने का काम करता हूँ। किसी तरह परिवार पाल लेते हैं।" उसका जवाब था। अब मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी। मुश्किल से रोटी-रोजी का जुगाड़ करने वाला यह व्यक्ति यहाँ दांडी यात्रा में किस उद्देश्य से है? इसे पार्टी में पद नहीं चाहिए, चुनाव लड़ने की तो बेचारा कल्पना भी नहीं कर सकता, ड्यूटी किसी ने लगाई नहीं और अडवंचरस तो ईश्वर ने इसकी जिंदगी वैसे ही बना रखी है। फिर किसलिए है यहाँ? और फिर ये सेवा का जुनून!! क्या वजह हो सकती? "रोटी-रोजी छोड़ कर दांडी यात्रा में क्या कर रहे हो?" मैंने उससे पूछा। "मैडम, मैंने सुना था कि देश की आजादी के लिए गांधीजी ने दांडी यात्रा की थी। आज फिर आप लोग उसी आजादी को बचाने और मजबूत करने को चल रहे हैं। मैं उस यात्रा के समय तो नहीं था, पर आज तो हूँ। मैंने सोचा जब आप सब इस महान काम के लिए घर-बार छोड़ कर चल रहे हैं तो आप लोगों की सेवा करके थोड़ा पुण्य मैं भी  कमा लूँ।"

                        सपाट और सरल शब्दों में जवाब दे कर 'रघुपति - राघव' गाते फिर निकल पड़ा। हम में से ही किसी 'महान दांडी यात्री' की सेवा के लिए...।


Published at https://www.babuaa.com/news/view/16387 on 2nd October 2020

Wednesday, September 30, 2020

प्रगति के विपरीत : राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020)

1903 में, भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने विश्वविद्यालय आयोग की सिफारिश के बाद एक नया विश्वविद्यालय विधेयक पेश किया। विधेयक पर टिप्पणी करते हुए, महान राष्ट्रवादी पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा, "विश्वविद्यालय आयोग की रिपोर्ट में सिफारिश के अनुरूप विश्वविद्यालय विधेयक, यदि कानून में पारित हो जाता हैं, तो  शिक्षा के क्षेत्र को प्रतिबंधित करने और विश्वविद्यालय की स्वायत्ता को पूरी तरह से नष्ट करने का कार्य करेगा, जिन पर काफी हद तक उनकी दक्षता और उपयोगिता निर्भर करती है, और यह उन्हें व्यावहारिक रूप से सरकारी विभागों में बदल देगा।" जहाँ विश्वविद्यालय विधेयक का उद्देश्य देश में उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार करना होता है, वहीं समालोचना से पता चलता है कि किस तरह यह बिल एक सारहीन तथा बिना दूरदृष्टि के तैयार किया गया था। उपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित किये गए विश्वविद्यालय विधेयक के 100 से अधिक वर्षों के बाद, भाजपा शासित भारत सरकार ने उसी उपनिवेशिक समान्तर सोच के साथ और भारत में शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय शैक्षिक नीति (2020) पारित की है।



एनईपी के सभी प्रावधानों में से, सबसे विनाशकारी और घातक विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए एक एकल नियामक के रूप में उच्च शिक्षा आयोग की शुरूआत है। अब तक, विभिन्न विश्वविद्यालयों, चाहे सार्वजनिक वित्त पोषित हों या निजी, उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियंत्रण में रखा गया था। इसी तरह, सभी तकनीकी संस्थान अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के नियामक प्राधिकरण के अंतर्गत आते हैं। ये दोनों संस्थान मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) का हिस्सा थे; और इसका मुख्य उद्देश्य भारत में उच्च शिक्षा को विनियमित करना था। यूजीसी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों को धन मुहैया कराता है; तथा इसने सदैव विभिन्न संस्थानों की संबद्धता के विषय में दृष्टि रखी; पाठ्यक्रम में एकरूपता होने के लिए दिशानिर्देश जारी किये; और विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक संघ, छात्रों और विभिन्न हितधारकों के बीच संघर्ष में मुख्य मध्यस्थ के रूप में काम किया। एनईपी के तहत, यूजीसी और एआईसीटीई दोनों को समाप्त कर दिया गया है और इनके स्थान पर उच्च शिक्षा आयोग (HEC ) को स्थापित किया गया है। हालाँकि सुधार की पक्षधर लॉबी ने एक स्वागत योग्य कदम के रूप में इसकी सराहना की है, परंतु यदि इसे लागु किया जाता है तो इस आयोग के साथ दो बुनियादी समस्याएँ हैं। सबसे पहले, यूजीसी और एआईसीटीई पहले से ही लाखों उच्च शिक्षा संस्थानों (कॉलेजों, राज्य के विश्वविद्यालयों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॉलेजों, अनुसंधान संस्थानों, नीति-थिंक टैंकों इत्यादि) की देखरेख की भारी जिम्मेदारी के साथ बोझिल रहे हैं। प्रतिनिधित्व/ विकेन्द्रीकरण के बिना एक अपरिपक़्व भारतीय शिक्षा प्रणाली, भारत में उच्च शिक्षा के इसी कुप्रबंधन का प्रमुख कारण है। इन दोनों नियामकों के सम्मुख  मुख्य समस्या- नकली, डीम्ड विश्वविद्यालयों, संबद्धताओं के बिना संस्थानों और खुले बाजार में डिग्री बेचने वाले विश्वविद्यालयों का उत्कर्ष है। इस संदर्भ में, एक प्रश्न पूछना चाहिए: जब दो नियामक संकट का प्रबंधन करने में सक्षम नहीं थे, तो एक केंद्रीकृत आयोग लाने से इस समस्या का समाधान कैसे हो सकता है? वास्तव में, एचईसी जैसे एक नियामक के तहत अधिकारों का केंद्रीकरण केवल कुप्रबंधन की मौजूदा समस्या को और अधिक बढ़ा देगा।



एचईसी के साथ दूसरी मूलभूत समस्या उसकी वर्गीकृत स्वायत्ता (Graded Autonomy) की अवधारणा है। एनईपी में उल्लिखित एचईसी के लिए जनादेश अगले 5-10 वर्षों तक सभी उच्च शिक्षा संस्थान को वर्गीकृत स्वायत्तता  (Graded Autonomy) प्रदान करना है। वास्तव में, शिक्षा प्रणाली में विभिन्न हितधारक (stakeholders) सरकार के फरमान से स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं। संस्थागत स्वायत्तता और दैनिक कार्यों में  अनावश्यक सरकारी नियंत्रण, सरकारी संस्थानों में नियुक्ति और पदोन्नति में राजनीतिक पक्षपात, आधुनिक पाठ्यक्रम को पढ़ाने की स्वतंत्रता पर अंकुश और नौकरशाही के हस्तक्षेप इत्यादि आज बहस का मुद्दा है। जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि NEP सरकार की तरफ से शिक्षण संस्थानों पर अपनी पकड़ ढीली करने का सकारात्मक प्रयास है। बहरहाल, मामला यह नहीं है। एनईपी के माध्यम से, भाजपा सरकार ने जो पेशकश की है, वह राज्य अथवा राजनीति से शैक्षणिक संस्थानों को स्वायत्तता देने का नहीं; वरन उन्हें वित्तीय स्वायत्तता / स्व-वित्तपोषण के घातक प्रावधान की ओर धकेलने का षड्यंत्र है। लगभग तीन दशकों से, भारतीय संस्थान धन की कमी, शिक्षक-छात्र अनुपात में गिरावट, बुनियादी ढांचे के उन्नयन में विफलता और चुनौतियों का सामना करने के कारण बीमारु स्तिथि में हैं। इस तरह के समय में, स्व-वित्तपोषित या वित्तीय स्वायत्तता का प्रावधान सार्वजनिक वित्त पोषित संस्थानों के भविष्य को मृत्युशैया पर डालने की कुचेष्टा है। यह सार्वजनिक शिक्षा का निजीकरण करने और इसे एक लाभदायक व्यवसाय उद्यम में बदलने का एक स्पष्ट प्रयास है। जब भी इसे लागू किया जायेगा, तो यह लाखों सामजिक व आर्थिक रूप से हाशिये पर आने वाले छात्रों को शिक्षा से बाहर कर दिये जाने का प्रमुख कारण बनेगा। इस योजना में, JNU / DU / HCU / TISS / AUD / JU जैसे प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालय बिना किसी वित्तीय सहायता व पोषण के समाप्त हो जाएंगे, जबकि निजी विश्वविद्यालय पनपेंगे। इससे न केवल सामाजिक असमानताएं पैदा होंगी और सीखने पर असर पड़ेगा, बल्कि इससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव भी पड़ेगा। वह दिन दूर नहीं जब कुकुरमुत्तों की भांति खुलने वाले निजी विश्वविद्यालय शैक्षिक डिग्री बेचने वाला मछली बाजार बन जाएगें।



जैसा कि राष्ट्रीय मीडिया में बताया गया है, एनईपी आरएसएस के एजेंडे का एक हिस्सा है, जो अपने अंधराष्ट्रवादी सांस्कृतिक एजेंडे को लागू करने और मजबूत करने के लिए प्रयासरत है। प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को लागू करना एक ऐसा ही प्रावधान है। यदि भाषा के मापदंड को हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए लाया जाता है, तो उन्हें हर स्तर पर पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। लेकिन यह तर्क देने के लिए कि अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी या क्षेत्रीय भाषा को लाया जाना चाहिए, उन्हें बढ़ावा देने के लिए एक अच्छी रणनीति नहीं है। भारत में कई दशकों से हिंदी का बिगुल बजता रहा है। हालांकि, इसे बढ़ावा देने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं। उदाहरण के लिए, SC और HC दोनों में, हिंदी में कार्यवाही भरने के लिए कोई जगह नहीं है। अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थान विशेष रूप से अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा देते हैं। सभी नौकरशाही और सरकारी आधिकारिक पत्राचार का माध्यम भी अंग्रेजी में ही होता हैं। क्या सरकार इस सबको बदलने जा रही है? उदाहरण के लिए चीन, रूस, तुर्की, फ्रेंच आदि देश सभी अपनी मातृभाषा में अपने सभी आधिकारिक और नौकरशाही कार्यों का संचालन करते हैं। वहां की सड़कों पर साइनबोर्ड और यहाँ तक कि उनके अंतरिक्ष स्टेशन के निर्देश तक मातृभाषा में ही लिखे होते हैं। इस प्रकार, यदि कोई हिंदी और क्षेत्रीय भाषा को बढ़ावा देने के बारे में गंभीर है, तो राज्य को क्षेत्रीय / राष्ट्रीय भाषा के प्रति आम जनता के पूरे ढांचे और दृष्टिकोण को बदलने में गंभीर निवेश करने की आवश्यकता है। हमें न सिर्फ हिंदी व क्षेत्रीय भाषा में मूल लेखन को बढ़ावा देना होगा बल्कि साथ ही क्लासिक अंग्रेजी लेखन का भी अनुवाद करना होगा।



वर्त्तमान में जिस प्रकार अंग्रेजी राष्ट्र के रोजमर्रा के जीवन पर हावी है, हिंदी को बढ़ावा देने का वादा सिर्फ एक खोखला कार्य प्रतीत होता है। अगर बीजेपी हिंदी को बढ़ावा देने के लिए वास्तव में गंभीर है, तो उन्हें इसे दैनिक, सामान्य लेनदेन की भाषा के रूप में अपनाना चाहिए। चूँकि अनिवार्य रूप से हिंदी/मातृभाषा का प्रावधान केवल सरकारी वित्त पोषित स्कूल पर लागू होगा, यह एक और वर्ग विभाजन पैदा करेगा। जिस तरह प्राचीन शिक्षा प्रणाली जाति आधारित आरक्षण पर आधारित थी, एनईपी इसे वर्ग के आधार पर आरक्षण से बदल देगा। अमीर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम, जो वैश्विक प्रतियोगिता की भाषा है, के निजी स्कूल में पढ़ाएंगे और सरकारी स्कूल में गरीब बच्चों को हिंदी भाषा सीखने के लिए मजबूर किया जाएगा। अत:भाजपा सरकार को मात्र अपना राजनीतिक एजेंडा थोपने के बजाय इस मामले को गंभीरता से देखना चाहिए।



अंत में, गांधीजी ने एक बार कहा था, "जो आम जनता के साथ साझा नहीं किया जा सकता है, वो मेरे लिए वर्जित है।" अतः हम उस प्रणाली को स्वीकार नहीं कर सकते हैं जिसमें आप विशेष वर्ग के बच्चों लिए कांच के घर उपलब्ध करते हैं और 90% स्कूली बच्चों के लिए पेंसिल और स्लेट नहीं हैं। इस प्रकार, नई शिक्षा नीति विभिन्न विचारों और धारणाओं के लिए स्थान को नियंत्रित करने की कोशिश मात्र है।


Published 2 August 2020 आलेख : प्रगति के विपरीत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 - डॉ. चयनिका उनियाल -

 http://indianlooknews.com/opinion/national-education-policy-2020-opinion-by-chaynika-uniyal/

Wednesday, September 12, 2007

विद्यार्थी ओर राजनीति

समय समय पर विद्यार्थियों के द्वारा राजनीति मे हिस्सेदारी को ले कर समाज के प्रबुद्ध एवं वरिष्ठ लोगों द्वारा प्रश्न उठाये जाते रहे है। उनका तर्क रहा है कि विद्यार्थी जिनका कि मूल उद्देश्य विद्या अध्यन करना है, यदि राजनीति मे सक्रीय रूप से भाग लेते है, तो क्या वे अपने मूल उद्देश्य से भटक नहीं जायेंगे? ओर क्या यह कार्य उनके भविष्य निर्माण मे बाधक नहीं होगा?

यह सही है कि विद्यार्थियों का मुख्य उद्देश्य पढाई करना है। उन्हें अपना पुरा ध्यान उस ओर लगाना चाहिऐ, लेकिन राष्ट्रिय परिस्तिथियों का ज्ञान ओर उसके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना भी शिक्षा मे शामिल होना चाहिऐ, ताकी वे राष्ट्रिय समस्याओं के समाधान मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके। क्यूंकि ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो विद्यार्थियों को देश की संरचना निमार्ण मे कोई भागीदारी नहीं देती- उन्हें व्यवहारिक रूप से अकर्मण्य बनाती है। उसे हम पूर्णत: सार्थक नहीं कह सकते है। वैसे भी एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र मे प्रत्येक नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति तथा राष्ट्रिय कार्यप्रणाली मेँ भागीदारी निभाता है ओर ऐसे मेँ राजीव गांधी द्वारा प्रदत्त १८ वर्ष के व्यस्क मताधिकार से छात्रों की भागीदारी तो स्वत: ही स्पष्ट हो जाती है।

अत: उपरोक्त परिस्तिथियों मे राष्ट्रिय नेतृत्व का दायित्व है की वे छात्रों मे, जिन्हे कल देश की बागडोर हर स्तर पर अपने हाथों मे लेनी है- नेतृत्व क्षमता पैदा करें, उन्हें उनके राष्ट्रिय कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक बनायें, उन्हें सांप्रदायिक व प्रथक्तावादी ताकतों के विरुद्ध एकजुट करें, उन्हें लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली से अवगत कराएँ ओर साथ ही राष्ट्रिय समस्याओं के समाधान मे उनकी भागीदारी सुनिश्चित करें। यदि वे ऐसा नहीं करते है तो वे ना सिर्फ राष्ट्र के साथ विश्वासघात करेंगे, बल्कि यह देश की भावी पीढी के साथ भी घोर अन्याय होगा। क्योंकी ऐसा ना करने पर भारतवर्ष मे एक ऐसी नेतृत्व शून्यता पैदा होगी जो देश को अनजाने अंधकारमय भविष्य की ओर धकेल देगी।

इसके अतिरिक्त छात्रों को भी चाहिऐ की वे पढे, जरुर पढे, परंतु साथ ही राष्ट्रिय गतिविधियों मे भी सक्रीय भागीदारी निभाए ओर अधिकार तथा जिम्मेदारियों को समझते हुये राष्ट्रिय परिपेक्ष्य मे जब, जहाँ, जितनी आवश्यकता हो अपना संपूर्ण योगदान दे। ऐसा करने पर ही वो भारतवर्ष को उन्नति के चरमोत्कर्ष ले जा सकने मे सफल हो सकेंगे तथा उस राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे जो नेहरू गांधी के सपनो का राष्ट्र था।

Wednesday, July 18, 2007

Struggle agunest brutal Chattisgarh Goverment

Chhattisgarh state Youth Congress organized Vidhan Sabha Gherao programme on 12th July to protest against- 1.paddy scam worth corers in the rice mill of a relative of BJP M.P. Tarachand Sahu, 2.take encounter in Punjer, 3.killing innocent tribals, 4.human rights violation under the cover of Chhattisgarh Public Security Act. 5.Rising Naxal threat

Other demands were- 1.CBI enquiry in tar scam and various other scams, 2.immediate suspension of unnecessary power cut in state, 3.Rs. 500 unemployment allowance to unemployed youths as per the declaration made by present B.J.P. government prior to last assembly polls.

The Gherao program was graced by former Chief Minister of Chhattisgarh Shri Ajit Jogiji, National Youth Congress President Shri Ashok Tanwar, State Youth congress president Yogesh Tiwari along with several other Congress MLA’S of state legislative assembly. The Program was carried out as per the expectations of Oscar Frnadis, incharge frontal organizations and supported by enthusiastic youth congress activists.

I have personally witnessed that during the course of demonstration, Youth Congress activists were subjected roughly from state police, who fired tear gas shells and even metal bombs alongwith water canyons and brisk lathi charge. The entire exercise by police injured 20 Youth Congress activists and one of them even received metal bombs in his body. The metal piece of 3-4 inch. Which got pierced inside the body was removed during operation and the YC activists is still nursing his wounds in the hospital.

On July 13 while YC activists were staying a peaceful demonstration in a democratic way, police again resorted to Lathi Charge and injured several other YC activists. The State BJP government didn’t calm down even after these incidents and police clamped various criminal charges against 1000 YC activists. The YC activist were treated like other regular criminals which formed house search and sending them to jail. Some other YC activists led by state president Yogesh Tiwari courted arrest and 43 YC activist were send to jail. Serious charges were clamped against YC activist that they failed to secure bail even today.

To secure unconditional release of YC activist and state president Yogesh Tiwari, YC members are resorting to various political measures like Chakka Jam, protest demonstration against the state BJP government but again the police is threatening to arrest them and clamp criminal charges. Congress Legislative Party raised the issue inside the assembly and stayed demonstration.

All these have failed to move the state BJP government. The arrested YC activist in protest against the policies of BJP government and to secure their unconditional release from jail are on relay hunger strike inside jail from July 16.

Saturday, June 16, 2007

भगतसिंह ओर उनके साथियों के लिए गांधीजी के प्रयास



भगत सिंह ओर उनके साथी सुखदेवराजगुर की फंसी की खबर सुनते ही संपूर्ण भारत वर्ष मे विरोध तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। ट्रिब्यून (लाहौर) के अनुसार "आंदोलन जबर्दस्त था। ना सिर्फ पंजाब बल्कि दुसरे प्रांतों मे भी इसमे हजारों लोगों ने भाग लिया। वायसराय ओर ब्रिटिश सरकार को लाखों व्यक्तियों के हस्ताक्क्षर से युक्त पत्र भेजा गया। समाचार पत्र के पृष्ठ रिहायी की मांग से भरे रहते थे। लाखों तार भारत मंत्री व वायसराय के नाम भेजे गए।" इतना ही नहीं ६ मार्च १९३१ को ब्रिटिश पार्लियामेंट मे मेक्तन, किड्ले, ब्राकवे, जावेट आदि कुछ सदस्यों ने भी वायसराय के नाम तार भेजा, जो इस प्रकार था - ' हॉउस आफ कामंस का इन्डिपेंड्स ग्रुप आपसे अनुरोध करता है की लाहोर षडयंत्र के कैदियों को रिहा कर दिया जाये।'

एसे मे आम भारतीय के मन मे यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है की जिस समय सम्पुरण भारत आक्रोश की ज्वाला मे जल रहा था, इन शहीदों के पक्ष मे गांधीजी ने कितना ओर क्या किया? इस संदर्भ मे सामान्यत: दो मत प्रचलित है। प्रथम, मत के अनुसार गांधीजी ने समझौते के अन्दर शर्त के रोप मे भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की फंसी रद्द कराने की बात नहीं रखी, पर व्यक्तिगत रूप से उस पर काफी जोर डाला। जैसा की गांधीजी की जीवनी के लेखक श्री तेंदुलकर ने लिखा है- गांधीजी ने इस अवसर पर कहा -'मैंने जहाँ तक भी मुझसे बन पड़ा वायसराय पर इसके लिए जोर डाला, मैंने उस पर तर्कों का सारा जोर लगा दिया'

पं.जवाहरलाल नेहरू के कथनानुसार-"भगत सिंह की सजा रद्द कराने के लिए गांधीजी ने जोरदार पैरवी की। इसे सरकार ने मंजूर नहीं किया। उसका समझोते से कोई संबध नहीं था। ......... मगर उनकी पैरवी बेकार गयी।"

'कंगारेस का इतिहास' नामक पुस्तक मे पट्टाभी सितारैमाया ने भी इस मत का समर्थन करते हुये लिखते है- "वार्ता के दौरान गाँधी इरविन के बीच भगत सिंह ओर उनके साथियों -राजगुरु सुखदेव, की फांसी की सजा को बदलने के विषय मे कयी बार लंबी बातचीत हूई थी।" वे आगे लिखते है- 'अधिकाधिक प्रयत्न कराने पर भी गांधीज इन तीनो युवकों की फांसी की सजा रद्द नहीं करा सके।'

लार्ड इरविन ने भी २० मार्च को चेम्स्फोर्ड क्लब मे अपनी विदायी के भाषण मे गांधीजी के इस कथन का समर्थन किया।

परंतु, इसी संदर्भ मे दुसरे मत के समर्थक- भगत सिंह के साथी क्रांतिकारी, वंपंती पार्टियां ओर वाम जनवादी इतिहासकार पहले मत को एक सिरे से खारिज करते हुए यह मानते है की गांधीजी ने फंसी की सजा को रद्द कराने मे किंचित मात्र भी कारगार कोशिशें नहीं की गयी थी। यहाँ तक कि उनके कुछ साथियों ने तो गांधीजी को दोषी भी ठहराया है। इस संदर्भ मे दुर्गा भाभी का कथन है- "गांधीजी से मिलाने का मौका तब मिला, जब भगत सिंह को फांसी हूई थी। मुझसे कहा गया कि मैं उनसे कहूँ कि पोलिटिकल प्रिजनर्स के मसले को भी अपनी वार्ता मे उठाएं। दिल्ली मे डा.अंसारी कि कोठी मे गांधीजी ठहरे हुए थे। सुशीला दीदी ओर मैं गए थे..................... गांधीजी ने समझा कि हम शायद इसलिये आये है कि हमसे फरार लाइफ कि मुसीबत झेली नहीं जाती, हमे मुक्ति दिलाएं। तो मुझे जरा फील भी हुआ। मैंने कहा.................. हम इसलिये आये है कि भगत सिंह, सुखदेव राजगुर को फंसी हो रही है। उन्होने कहा कि वे तो हिंसा मे विश्वास रखते है ओर यह है, वह है, ओर हम लोग चले आये।"

सरकारी दस्तावेज भी दुसरे अत का समर्थन करते हुए गांधीजी के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगते प्रतीत होते है। राष्ट्रिय संग्रालय मे ग्रह विभाग के राजनीतिक शाखा के अनुसार गांधीजी ने इरविन से दो दिन १८ फरवरी व १९ मार्च, भगत सिंह पर बातचीत की। इरविन ने अपने रोजनामचे मे लिखा है- "दिल्ली मे जो समझौता हुआ, उससे अलग ओर अंत मे गाँधी ने भगत सिंह का उल्लेख किया। उन्होने फाँसी की सजा रद्द करवाने के लिए पैरवी नहीं की, पर साथ ही वर्त्तमान परिस्तिथियों मे फाँसी स्थगित कराने के विषय मे भी कुछ नही कहा।"

१९ मार्च को अन्तिम बार भगत सिंह पर बातचीत हुई। इरविन ने अपने रोजनामचे मे लिखा है- " जब मिस्टर गाँधी जाने को ही थे, तो उन्होने मुझसे पूछा की उन्होने अखबार मे २३ तारीख को भगत सिंह को फाँसी देने की बात पढी है, क्या वे इस संबंध मे कुछ कह सकते है? उनका कहना थी की यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा, क्योंकि उस दिन करांची मे नए चुने गए अध्यक्ष पहुँचाने वाले थे ओर उस दिन जनता बहुत जोश मे होगी। मैंने उनसे कहा की, मैंने इस मसले मे बहुत संजीदगी से विचार किया, लेकिन मेरा विवेक मुझे अनुमति नहीं देता की मैं सजा को घटा दूँ। मुझे ऐसा लगा की उन्होने मेरे ट्रक को मान लिया ओर उन्होने मुझसे कुछ नही कहा। "



२० मार्च को वायसराय की कौंसिल के ग्रह सदस्य इमरसन से मिले। इमरसन ने अपने रोजनामचे लिखा है- "मि.गाँधी की मसाले मे अधिक दिलचस्पी मालुम नही हूई। मैंने उनसे कहा की यदि फाँसी के फलस्वरूप अव्यवस्था नहीं हूई तो वह बड़ी बात होगी। मैंने उनसे कहा की वे सब कुछ करे ताकी अगले दिनों मे सभाएँ ना हो ओर उग्र व्याख्यानों को रोकें। इस पर उन्होने अपनी स्वीकृति दे दी ओर कहा जो कुछ भी मुझसे हो सकेगा मई करुंगा।

इन सभी तथ्यों मे सर्वाधिक रोचक है गांधीजी द्वारा २० मार्च (फांसी से तीन दिन पूर्व) ग्रह सदस्य से हूई बातचीत ओर उनके पत्र के उत्तर मे लिखा गया पत्र -
"प्रियवर इमरसन,
अभी जो आपका पत्र मिला उसके लिए धन्यवाद। आप जिस सभा का उल्लेख कर रहे है, इसका मुझे पुरा पता है। पुरी एहतियात ले ली है ओर आशा करता हूँ की कोई गडबडी नहीं होगी। इस उत्तेजना को सभाओं के जरिये निकल दिए जाना ही उचित होगा।"
दोनों मतों का का गंभीरतापूर्वक अध्यन्न कराने पर दोनो मे एक मुख्य बात समान नजर आती है। दोनों ही मत (भारतीय कांग्रेसी नेता व सरकारी दस्तावेज) इस बात पर सहमत है की इरविन ओर गांधीजी के बीच भगत सिंह ओर उनके साथियों को ले कर बातचीत हूई। किन्तु बातचीत का स्वरूप क्या था? इसी के संदर्भ मे दोनो के मध्य प्रमुखत: मतभेद है। इनमे कोई ना कोई कहीँ ना कहीँ झूट जरुर बोल रह है ओर इस झूट का उद्देश्य देश की जनता को धोका देना है। गाँधी, नेहरू, पत्ताभी जैसे नेताओं से ऐसे झूट की उम्मीद नहीं की जा सकती। गांधीजी से तो बिल्कुल भी नहीं। जिन्होंने अपने जीवन के कड़वे से कड़वे सच को अपनी आत्मकथा मे जिस तरह जगजाहिर किया था - वो सार्वजनिक जीवन के किसी भी व्यक्ति के लिए बडे दु:सहस की बात है। साथ ही दुसरी ओर 'बांतो ओर राज करो' की निति पर आधारित झूट व कपट पर निर्मित सरकार है। जिससे ऐसे झूट की अपेचा करना आर्श्चय जनक नहीं है। ऐसा होने की पुरी पुरी संभावना है की स्वाधीनता संद्रम की दोनो धाराओं के बीच खायी को मोती कराने हेतु सरकार ने गांधीजी की भूमिका को दबा दिया हो, ताकि क्रन्तिकारी साम्राज्यवाद से संघर्ष कराने की बजाय गांधीजी से संघर्ष करने लगे। अत: किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचाने से पहले इस पहलू को नजर अंदाज नहीं करना चाहिऐ।

ओर ऐसा भी नहीं था की गांधीजी को भगत सिंह ओर उनके साथियों के लिए कोई दुःख नहीं था। उन्होने कहा था- अस्थायी संधि के लिए मध्यस्थ करने वाले हम सत्य ओर अहिंसा के अपने प्रण व न्याय की सीमाओं को नहीं भूल सकते थे। ............ यदि आपको हिंसा पर ही विश्वास है, तो आपको निश्चय पूर्वक बता सकता हूँ की आप केवल भगत सिंह को ही नही छुडा सकेंगे, बल्कि आपको भगत सिंह जैसे हजारों युवकों का बलिदान करना पड़ेगा। मई वैसा कराने को तैयार नहीं था ओर इसलिये मैंने सत्य ओर अहिंसा का मार्ग ज्यादा बेहतर समझा।'

अत: ऐसे मे यह प्रश्न उठाना भी स्वाभाविक गांधीजी अगर भगतसिंह ओर उनके साथियों को नहीं बचा पाए, तो खुले टूर पर इसके विरोध मे कोई आंदोलन आरम्भ कर, उनकी शहादत की आक्रोश के साथ्स्वधिनता संग्राम की गाडी को आगे क्यों नहीं ले गए?

जैसा की स्राव विदित है की गांधीजीभगत सिंह दोनो की विचारधाराओं व उनके कार्यक्रमों के साथ साथ संघर्ष के तरीकों मे गहरा मतभेद या अंतर था। इस संदर्भ मे दोनों मे समय समय पर द्व्ध व संवाद चलाता रहता था। दोनों ने ही एक दुसरे के तोर तरीकों की खुली तोर पर कड़ी आलोचना की है। जो कभी कभी अत्यंत तीखी हो गयी। दोनों ने ही एक दुसरे के प्रति अपने मनोभावों को जनता से नही छुपाया। दोनों ही अपने अपने आदर्शों के प्रति पूर्ण समर्पित व्यक्ति थे। एसे मे गांधीजी यह कदम उठाते तो यह उनका अपने आदर्शों को तिलंगाली व भगत सिंह के विचारों के सम्मुख समर्पण व उनको वैधता देना होता। वो गाँधी जिन्होंने जीवन पर्यंत कठिन से कठिन दौर मेँ अपने आदर्शों- सत्य ओर अहिंसा- को नहीं छोड़ा, यदि भावुकता मे बहकर अपने आदर्शों के साथ सम्झोता कर लेते, तो क्या यह देश आज की भांति उन पर गर्व कर पाटा?अत: गाँधी ने जो किया वो उनके आदर्शों के अनुरुप था, जिसके लिए उन्हें दोषी ठहराना सर्वथा अनुचित है।

हिंसा अंग्रेज करे या उनका पुत्र दोनों ही उनके लिए निंदनीय था। परंतु, पर इसका अर्थ यह नहीं की हम उनके पुत्र प्रेम प्रेम पर प्रश्नचिन्ह लगा दें।






Wednesday, May 9, 2007

युवाओं के नाम संदेश


किसी ने सच ही कहा है कि 'युवा शक्ति क्या नही कर सकती , युवाओं ने विश्व में अनेक क्रान्तियां की है।' दोस्तो विश्व मे विभिन्न देशों के बदलाव मे , उनके विकास मे , युवाओं का ही हाथ रहा है। हमे दुसरे देशों का इतिहास देखने की क्या आवश्यकता है, हमारा अपना इतिहास युवाओं के संघर्ष ओर कुर्बानियों से भरा हुआ है। चापेकर बंधु, खुदिरम बोस, भगत सिंह, अशफाक उल्हा खान, चंद्रशेखर आजाद आदि युवाओं कि क़ुरबानी ओर बाल-लाल- पाल, जवाहर लाल नेहरू , सरदार पटेल, सुभाष चंदर बोस, मौलाना आजाद जैसे युवाओं के संघर्ष का ही परिणाम है कि भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न गणराज्य है ओर हम सभी आजादी कि खुली हवा मे सांस ले प रहे है। परंतु दोस्तो, दुर्भाग्य से देश का महौल चिंताजनक हो रहा है। विघटनकारी शक्तियां जाती, धर्म या छेत्र के नाम पर इस देश कि एकता व अखंडता पर बार बार प्रहार कर इसे त्रस्त भ्रष्ट व नष्ट कराने पर तुली है। आज के हालत पे किसी शायर का ये कथन सटीक सिद्ध प्रतीत होता है-

"सच तो लुट गया है झूट बाक़ी है-
शबनम कि जगह तपन बाक़ी है,
आज आंखें हैरत मे है परेशां-
इन्सान लापता है कफ़न बाक़ी है"

दोस्तो आज समय आ गया है कि हम अपने आप से पूछें कि ऐसा क्यों होता है कि आजादी के इतने सालों बाद एक प्रदेश दुसरे प्रदेश को बिजली व पानी देने से मना कर देता है? ऐसा क्यों होता है कि एक राज्य से दुसरे राज्य मे जाते ही हम अपने ही देश मे परदेसी महसूस करते है? ऐसा क्यों होता है कि एक इन्सान दुसरे इन्सान की जान लेने मे इस लिए नही हिचकिचाता कि सामने वाला दुसरी जाती या धरम या छेत्र से है? हमे अपने आप से ये भी पूछना है कि क्या भगत सिंह सिर्फ सिखों या पंजाब की आजादी के लिए फंसी के फंदे पे झूले थे? क्या अशफाक उल्हा खान की शहादत ओर मौलाना आजाद का संघर्ष सिर्फ मुसलमानो या उत्तर प्रदेश के लिए था? जवाहर लाल नेहरू ने अपने सारी जवानी जेल में संघर्ष करते हुये गुजारी तो क्या सिर्फ पंडितों के लिए? सुभास चंदर बोस ने आजाद हिंद फौज का निर्माण क्या सिर्फ कायस्थों या बंगालियों की आजादी के लिए किया था? नहीं वो लड़े थे अटक से लेकर कटक तक ओर कश्मीर से लेके कन्यान्कुमारी तक रहने वाले हर भारतवासी के लिए।

दोस्तो आज हमारे पास दो ही रास्ते है या तो हम इन विघटनकारी ताकतों के रस्ते पर चल के अपने देश को खंडित होने दे या हम अपने देश को ऐसा बनायें जिसका सपना देखते हुये तिलक, गोखले, गाँधी, नेहरू, सुभाष, मौलाना, पटेल आदि ने सारा जीवन संघर्ष करते हुये गुजार दिया ओर जिसका सपना देखते हुये भगत सिंह , चंद्र शेखर आजाद , अशफाक ने जान तक कुरबान कर दी। बहुत पहले एक कवि इकबाल हुये थे। जिन्होंने एक बहुत सुन्दर गीत लिखा था 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा '। यदि हम चाहते है कि भविष्य मे इस गीत को गुनगुनाते वक्त हमारी आंखें शर्म से ना झुके , यदि हम चाहते है कि इस गीत को गुनगुनाते वक्त हमारे दिल मे कोई मलाल ना हो, यदि हम चाहते है कि इस गीत को गुनगुनाते वक्त हम हमारी भावी पीडी को जवाब देने मे असमर्थ ना हो जाएँ , तो हमे वाही देश बनाना होगा, जिसका सपना हमारे शहीदों ने देखा था। ताकी हम भविष्य मे पुरे आन् बान ओर शान से गुनगुना सके 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा'।

दोस्तो अब वक्त आ गया है हम सब मिलाकर इन विघटनकारी शक्तियों का जवाब दें। उन्हें बता दे कि इस देश का यूवा उन्हें जाती, धरम या चेत्र के नाम पर देश को तोड़ने की इजाजत कदापि नही देगा। इस संघर्ष मे हमे पसीना तो क्या ख़ून भी बहाना पडे तो हिचाकिचाना नही है। इस देश का भविष्य हमारे हाथों मे है ओर उसे हमे उज्जवल बनाना है। यही हमारा संकल्प होना चाहिऐ। किसी शायर ने ठीक ही कहा है-

"अब हवाएं ही करेगी रोशनी का फैसला -
जिस दिए मे जान होगी वो दिया जलाता रहेगा"

ओर हमे बता देना है कि हमारे जोश व संकल्प रूपी दिए को बडे से बड़ा तूफ़ान नही बुझा सकता। तो आओ दोस्तो हम सभी मिलके आज ये संकल्प ले कि राष्ट्रिय हित मे हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने मे नही हिचकिचाएंगे ओर इस देश को एक ऐसा देश बनायेंगे जिस पर हमे ही नही वरन पुरे विश्व को नाज हो।किसी ने युवाओं के लिए ही कहा है-

"जब हम मचलते है तो तूफ़ान मचलते है-
जब हम उबलते है तो भूचाल उबलते है,
हमे बदलने कि कोशिश ना करना-
हम बदलते है तो इतिहास बदलते है "

तो आओ हम अपने को इस क़दर बदले कि आने वाले समय मे जब वर्त्तमान का इतिहास लिखा जाये तो हम उस पे गर्व कर सकें।

Wednesday, April 25, 2007

प्रेम ही परमेश्वर कि व्यवस्था का मूल है

धर्म परमेश्वर कि व्यवस्था है, जिसे उसने संपूर्ण प्राणी जगत के लिए जारी किया है। हालांकि इसे परमेश्वर द्वारा लिखित रूप से जारी नहीं किया गया है, किन्तु उसके द्वारा भेजे गए पैगम्बरों द्वारा समय समय पर इसे प्रकट अवश्य किया गया है। असल में कठिनाई यह कि जिन्हें हम धर्म कहते है वह धर्म नहीं, संप्रदाय है। कोई संप्रदाय परमेश्वर कि व्यवस्था (धर्म) नही है। यह पूर्णत: धरती कि व्यवस्था है तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए समय समय पर अवतरित महापुरशों द्वारा दिखाए गए रस्ते का एक हिस्सा है। हिंदु, मुस्लिम, सिख, जैन, इसाई, बौद्ध, फारसी, यहूदी एवं कम्युनिस्ट परमेश्वर द्वारा वर्गीकृत नही किये गए है। संप्रदाय, जाति एवं राष्ट्र धरती कि व्यवस्थाएं है तथा पुरी तरह परमेश्वर कि इच्छा के विरुद्ध मनुष्य द्वारा बनाईं गयी है। आज प्रत्येक व्यक्ति को एक साथ उक्त तीनो ही व्यवस्थाओं का पालन करना पङता है। इस आपा धापी मे वह ना चाहते हुये भी परमेश्वर कि व्यवस्था से दूर चला गया है। हमे धरती कि व्यवस्थाओं का सम्मान करना चाहिऐ, किन्तु परमेश्वर कि व्यवस्था 'प्रेम' का परित्याग करके नहीं। विश्वास, आशा व प्रेम तीनों ही स्थाई है, किन्तु इन में सबसे बड़ा प्रेम है। स्पष्ट है कि प्रेम के बिना विश्वास अधूरा है , ओर विश्वास के बिना आशा अधूरी है, ओर आशा नहीं वहां प्रेम संभव नहीं। अतएव यही अन्तिम सत्य है कि प्रेम ही परमेश्वर कि व्यवस्था का मूल है, जबकी धरती कि व्यवस्थाओं मे इसका आभाव है। यही ईश्वरीय व्यवस्था ओर धरती कि व्यवस्था का अंतर है।

प्रश्न उठाता हैकि क्या धर्म परिवर्तन संभव है? मेरी जानकारी मे संभव नही है, क्योंकि यह एक स्वर्गीय व्यवस्था है। इसे छोड़ा जा सकता है, इसका विरोध किया जा सकता है,इसकी गलत व्याख्या कि जा सकती है, किन्तुं इसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता। ह्रदय परिवर्तन सम्भव है, क्योंकि यह व्यवस्था मनुष्यों द्वारा निर्मित है। अतएव इसे अपनाने, मानाने व छोड़ने का अधिकार भी मनुष्य को है। प्रत्येक व्यक्ति अपने विकास व शांति के लिए व्यवस्था परिवर्तन का हकदार है। दबाव व प्रलोभन मे किया गया परिवर्तन स्थाई नही होता, ना ही यह नैतिक व उचित है। सुह्रादय परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक अधिकार है तथा इसका विरोध हर स्तर पर निंदनीय है।
विश्व मे स्थायी शांति के लिए जरुरी है कि हम सब मनुष्य द्वारा निर्मित व्यवस्थाओं को सामुहिक रूप से तिलांजलि दे कर - एक गड़रिया (परमेश्वर) एक झुंड (संपूर्ण मानव जाति) , एक मार्ग (प्रेम धर्म) , एवं एक मंजिल (शांति, मैत्री व सहयोग) के सिद्धांत पर चल पडे। धुर्व, प्रह्लाद, इब्राहीम,महावीर, बुध, ईसा, नानक, कबीर,कालामाक्स्र , अम्बेडकर ओर गाँधी का विश्वास धरती कि व्यवस्थाओं के लिए एक चुनौती है तथा संपूर्ण मानव जाति के लिए एक सीधा मार्ग है। आओ हम सीदा मार्ग चुने।

दैनिक नव ज्योति मे प्रकाशित