Showing posts with label women. Show all posts
Showing posts with label women. Show all posts

Tuesday, November 11, 2014

A Lady's Simple Questions & Surely It Will Touch A Man's heart...

Note: Don't personliz it please.
लोग पत्नी का मजाक उड़ाते है। बीवी के
नाम पर कई msg भेजते है उन सभी के लीये
--------------
देह मेरी ,
हल्दी तुम्हारे नाम की ।
हथेली मेरी ,
मेहंदी तुम्हारे नाम की ।
सिर मेरा ,
चुनरी तुम्हारे नाम की ।
मांग मेरी ,
सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।
माथा मेरा ,
बिंदिया तुम्हारे नाम की ।
नाक मेरी ,
नथनी तुम्हारे नाम की ।
गला मेरा ,
मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।
कलाई मेरी ,
चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।
पाँव मेरे ,
महावर तुम्हारे नाम की ।
उंगलियाँ मेरी ,
बिछुए तुम्हारे नाम के ।
बड़ों की चरण-वंदना
मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष
तुम्हारे नाम का ।
और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।
घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।
और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।
सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का...
Namrata se puchti hu?
आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?
एक लड़की ससुराल चली गई।
कल की लड़की आज बहु बन गई.
कल तक मौज करती लड़की,
अब ससुराल की सेवा करना सीख गई.
कल तक तो टीशर्ट और जीन्स पहनती लड़की,
आज साड़ी पहनना सीख गई.
पिहर में जैसे बहती नदी,
आज ससुराल की नीर बन गई.
रोज मजे से पैसे खर्च करती लड़की,
आज साग-सब्जी का भाव करना सीख गई.
कल तक FULL SPEED स्कुटी चलाती लड़की,
आज BIKE के पीछे बैठना सीख गई.
कल तक तो तीन वक्त पूरा खाना खाती लड़की,
आज ससुराल में तीन वक्त
का खाना बनाना सीख गई.
हमेशा जिद करती लड़की,
आज पति को पूछना सीख गई.
कल तक तो मम्मी से काम करवाती लड़की,
आज सासुमां के काम करना सीख गई.
कल तक भाई-बहन के साथ
झगड़ा करती लड़की,
आज ननद का मान करना सीख गई.
कल तक तो भाभी के साथ मजाक करती लड़की,
आज जेठानी का आदर करना सीख गई.
पिता की आँख का पानी,
ससुर के ग्लास का पानी बन गई.
फिर लोग कहते हैं कि बेटी ससुराल जाना सीख
गई.
Salute to all girls. :)

Friday, January 4, 2013

आखिर क्यूँ?


28 दिसंबर कांग्रेस स्थापना दिवस पर रामलीला मैदान, जयपुर में "संकल्प रैली एवं विशाल जन सभा' का आयोजन किया गया, कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्न हुआ।परन्तु दिन भर के व्यस्तता के बाद जब टी वी खोल तो बड़ी दुखद खबर का सामना हुआ- दिल्ली गैंग रेप पीड़ित लड़की की हालत बेहद नाजुक, कई अंगों ने काम करना बंद किया :-( दिल से एक ही प्रार्थना निकली कि ईश्वर उसे शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करे तथा एक सामान्य जीवन जीने का एक और मौका दे। परन्तु आख़िरकार जीवन और मृत्यु के बीच का संघर्ष समाप्त हुआ, आखिरकार जिंदगी हारी। पीडिता ने देर रात 29 दिसम्बर को अंतिम साँस ली। शोक, क्षोभ, पीड़ा, क्रोध ये सभी भाव एक साथ मन में जाग उठे :( दिल से एक ही प्रार्थना निकली - "हे भगवान इस दुनियां में तो उसे दर्द, पीड़ा और यातना मिली, परन्तु उसे आप अपने आपर स्नेह से सकून व शांति प्रदान करना। उसके प्रियजनों को इस दुःख की घडी में संबल देना।" आज ये सोच के और तकलीफ होती है की 2000 से 2005 तक पी एच डी के कार्य के लिए तीन मूर्ति व् राष्ट्रिय अभिलेखागार जाने हेतु, NSUI व युवा कांग्रेस में राष्ट्रिय पदाधिकारी रहते हुए कार्यालय जाने हेतु दिल्ली की बसों की सवारी मैंने भी बहुत की थी, रात में इनमे यात्रा तब भी सुरक्षित नहीं थी आज भी नहीं है। परन्तु मै शायद भाग्यशाली थी।
इस घटना ने सबको हिल कर रख दिया नए कठोर कानून की मांग जोर शोर से उठाई जा रही है। परन्तु मेरी व्यक्तिगत रे तो यह कि सिर्फ नया कानुन बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, कानुन लागु भी होना चाहिए। अपराध की सजा तुरन्त मिलनी चाहिए। महिलाओं के प्रति समाज में पुरुषों की सोच बदलनी चाहिए, नेता और पुलिस इसी समाज में से ही आते है। परन्तु अफसोस तब होता है जब मै पुरुषों की सोच बदलने की बात फेसबुक पर करती हूँ बहुत लोग इस बात को सिरे से नकार देते है कि किसी बदलाव की आवश्यकता भी है, ऐसे में बदलाव बहुत दूर नजर आता है। आखिर 100 करोड़ से अधिक की आबादी में कुछ हजार हाथों में कैंडल से सामाजिक बदलाव नहीं आएगा, बदलाव के लिए करोड़ों हाथों के उठाने की जरुरत पड़ेगी। आखिर सबकुछ सिखाया जा सकता है, परन्तु दुसरे की भावनाओं की कद्र करना किसी को कैसे सिखाया जा सकता है? आखिर ये तो महसूस करने की बात है, ना कि सिखाने की।  

अब देखिये मध्य प्रदेश के एक मंत्री का बयान आया " लक्ष्मण रेखा न लांघे, वरना हरण तो  ही।" मतलब सीता हरण में कसूर सीता का था रावण का नहीं? वाह री दोहरी मानसिकता और दोहरे मापदंड! जिस धर्म में अर्धनारीश्वर की कल्पना हो, उस समाज में लक्ष्मण रेखा सिर्फ महिलाओं के लिए ही क्यूँ? क्या पुरुषों के लिए कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होनी चाहिए? भगवान आपसे से एक प्रार्थना है, इस देश में जितने भी पुरुष इस तरह की दोहरी मानसिकता वाले है उन्हें अगले जन्म में महिला बना के पैदा करें और उन्हें इस जन्म की सोच और कर्म याद रहें। आपके लिए भी ये देखना रोचक होगा की उनकी सोच वही रहती है या बदलती है :) अफ़सोस आज हर कोई महिलाओं की मर्यादा, महिमा, उनको पूजे जाने के बारे में बात कर रहा है। परन्तु कोई भी उनकी आजादी, अधिकार और बराबरी की चर्चा तक नहीं करता। आखिर क्यूँ?

Tuesday, August 14, 2012

कहते है कि लड़की की इज्जत कांच कि तरह होती है, अगर टूट जाए तो जीवन भर के लिए दरार आ जाती है|
और लडके कि इज्जत.....................????
???
शायद होती ही नहीं :P

Friday, March 7, 2008

One More Women's Day

So we are again going to celebrate one more women's day. The very words put in my mind the pictures of long processions carrying verious slogans and soughting loudly for- Women's rights, Women's welfare, Women's respect and raising their voices againest Women's exploitation, torture of sufferings. The voice will be raised all about that in conferences and other progarammes made by many women's clubs or women welfare society or political parties etc. They will again talk about the duel rules and unjustice made by the society from thousands of years, and will blame either men or the society or even woman herself for all this. All thease things also done by them whole the year symbolicaly. But the question is that one day celebration or the symbolic agitations through the whole year, is enough for the struggle of equality? What should be more than that?

It is not becouse i want to minimize or underestimate their endeavours in this field. They do their best and they must be appreciated and thanked for all their efforts. But what i think is that an ordinary woman, or a rustic woman living in remote areas of our country can't be benefited by such clubs or societies or activities of political parties. Our orthodox women not even like the steps of tham. Not only rustic or ordinary women but even educated women don't want to create a fuss about their private lives. To a great extent they rather tolerate every kind of unjust treatment in their families.They, as i think, seem to think that this is destiny of a woman- to endure the torture, forget the torture and be prepared for further torture. A woman dose not want to go to the court, she can not even think of taking divorce. She only waits for her own destiny to be kind enough to make her happy. There might be exceptions in this case, but general survey is so.

Now what can be done? how can we prepare our suffering women to be bold? this boldness can not come in a creature all of sudden. Some-how we should try to change our thinking. The neccessity is to think sympathetically and reasonably about their condition. they themselves should try to be just about themselves. In our social as wel as private life we should try to be wise & alert about it. The whole society, country & the whole world have to be aware about their condition. In last but not least, i can say that when in every family a woman will given equal status, than this " Women's Day" will be meaningful. Only the celebration of Women's Day can't be enough.

Friday, June 29, 2007

नियति ?

पिछले दिनों से बिमारी ने लंबी छुट्टी दिला दी। आज वकत काटने के लिए काफी समय से ला के रखी हूई फिल्म "वाटर" देखी, तो बार- बार आंखें नम होने से ओर ह्रदय को आक्रोश से भर जाने से रोक पाना संभव ना हुआ। यह तो बचपन से जवानी तक के सफ़र मे ही ज्ञात हो गया था (यद्यपि मेरे माँ- पिताजी ने कभी इसका अहसास नहीं कराया) की इस समाज मे स्त्रियों ओर पुरुषों के लिए दोहरे मापदंड सदियों से चले आ रहे है। जिन्हें स्त्रियाँ अपनी नियति मानकर जीवन भर पुरी ईमानदारी व निष्ठा से निर्वहन करने का प्रयास करती है। प्रयास मे चुक की सजा भी नियति का हिस्सा है।

दीपा महता ने विधवाओं के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार का ह्र्दयास्पर्शी चित्रण करने का प्रयास "वाटर" मे किया है। कुछ संवाद ह्रदय को तीर की तरह भेदते है, जैसे- "बाल विधवा का मासूम प्रश्न 'पुरुष विधवाओं के आश्रम कहॉ होते है?" बुद्दी बुआ का लड्डू के लिए तरसना, जहाँ लाचारी व बेबसी को दरसता है, वहीं बाल विधवा का भीख मँगाने वाले प्रसंग पर "डूब मरो" कहना या दीदी का कल्याणी के कमरे का ताला खोल कर उसे भगाने के लिए कहना- सामाजिक व्यवस्था के प्रति विद्रोह को दर्शाता है।

परन्तु बात सिर्फ विधवाओं की ही तो नहीं- यह दोहरे मापदंड तो जीवन के हर कदम, हर स्तर पर दिखायी पड़ते है। हालांकि बहुत से लोगों की जुबान से यह सुनाने को मिल जाएगा की हिंदु धर्म मे सैदेव ऐसी स्तिथी नही थी ओर वे बडे गर्व से वैदिक मंत्रों की रचियाताओं का नाम भी गिनावा देते है। देवियों की महिमा भी सुनायी जाती है। पर यहाँ प्रश्न यह है की वैदिक मंत्रों की रचियता स्त्रियों के नाम उंगलियों पर गिनाने लायक है ओर उन चांद स्त्रियों से हम तत्कालीन समाज की संपूर्ण स्त्री जाती की स्तिथी का आंकलन तो नहीं कर सकते। जिस समाज के सम्मानित वर्ग की बेकसूर अहिल्या पत्थर बाना दी जाती हो, परम पवित्र सीता अग्नी परीछा देने को मजबूर हो, बेबस द्रोपदी सरेआम बेइज्जत हो , उस समाज की आम स्त्रियों की कल्पना स्वाभाविक है। कहीँ ऐसा नहीं लगता की समाज ने उन्हें देवी बनाते बनाते, उनमे इनसान होने के अहसास को ही ख़त्म कर दिया है। फिर सिर्फ हिंदु धर्म ही क्यों - दुनिया का कोई भी धर्म स्त्रियों को पुरुषों की बराबरी का दर्जा नही देता। बल्कि कुछ तो उन्हें मोक्ष प्राप्ति के लायक ही नही मानते। फिर भी आर्श्चय इस बात का है की स्त्रियाँ ही सबसे अधिक धर्म परायण होती है।

प्रकति ने मात्र शारीरिक सरंचना मे स्त्री व पुरुष मे विभेद किया है। उसके बावजूद स्त्रियों ने जब जब भी उन्हें अवसर मिल हर क्षेत्र मे अपनी योग्यता को सिद्ध किया है- चाहे वेदो की रचना मे गार्गी- मैत्रेयी आदि का योगदान हो, भक्ती आंदोलन मे मीरा की देन हो, एक सुलतान के रूप मे रजिया की भूमिका हो, स्वतंत्रता आंदोलन मे रानी लक्ष्मी बायी, बेगम हजरत आदि महिलाओं का संघर्ष व सहादत हो, या फिर आधुनिका भारत मे नए कीर्तिमान बनाती किरण बेदी, कलपना चावला, सानिया मिर्जा, पीटी उषा, सुशामिता सेन .......................... सबसे बढ कर इंदिरा गांधीजी, जिनका शासन काल सभी पुरूषों के शासन काल पे भारी है।

आज २१विन् सदी मे हालांकि स्त्रियाँ हर क्षेत्र मे अपने आपको साबित कर रही है ओर साथ सामाजिक जागरुकता धीरे धीरे उनके लिए अवसरों के द्वार खोलती जा रही है। आज हमारे देश की सबसे प्राचीन बड़ी व राष्ट्रिय पार्टी की अध्याक्षा एक महिला- सोनियाजी है ओर देश मे पहली बार एक महिला राष्ट्रपति बनने जा रही है। खेल हो, विज्ञानं हो, प्रशासन हो, राजनीति हो, शिक्षा जगत हो - हर जगह महिलाएं सफलता का परचम लहरा रही है। पुरा देश वर्ष २००७ को महिला सशक्तिकरण के रुप मे मना रह है। परन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न याहा है की घर से बाहर निकल कर सार्वजनिक क्षेत्र् मे कार्य कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत क्या है? नारी मुक्ति या स्वतंत्रता की बात करने वाली स्त्रियों को समाज मे सार्वजनिक स्वीकारोक्ति मिल पायी है? आज हर सफल स्त्री क्या समाज के लंछानो व प्रश्नों से अपने आप को बचा पायी है?

हक़ीकत यही है की आज भी इस देश की ८०% आबादी गावों मे उन्हीं पुरानी रुढियों के साथ जीवन बिता रही है। यह सही है की सती प्रथा विरोधी कानून ने स्त्रियों को जिन्दा अग्नी मे जल के मरने से तो बचा लिया, परन्तु रुढियों की अग्नी मे रोज तिल तिल के सुलगने से उन्हें कौनसा कानून बचायेगा? ओर फिर जिस देश मे आज भी नन्हीं बालिकाओं के साथ बलात्कार होते हो, जहाँ बहुएं दहेज़ के लालच मे जिंदा जला दी जाती हो,विधवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार होता हो, स्त्रियाँ देह व्यापर मे धकेली जाती हो,ओर तो ओर बालिका का जन्म ही अमंगाल्कारी माना जाता हो, २१विन् सदी मे भी बेटी माँ- बाप के लिए पराया धन ओर शादी मे दान कराने की वस्तु हो- वहाँ ये सब प्रतीकात्मक उपल्ब्धिया, क्या गर्व कराने लायक है? यही विचार कराने का सही वक्त है.................. तभी वास्तविक नारी सशक्तिकरण संभव हो पायेगा।

Tuesday, June 19, 2007

DIFFERNET ROLE OF WOMEN













Sender : Rajaram Taparia