Wednesday, September 30, 2020

बिना वजह बगावत

अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रही नोक-झोंक व राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब कांग्रेस सरकार को बचाने के लिए एक पिता की कोशिश व एक जिद्दी बच्चे के अपने ही घर को तोड़ने के प्रयास के रूप में एक पारिवारिक झगड़े की तरह प्रतीत हो रही है। चल रहे घटनाक्रम ने केएल मीडिया (खान बाजार + लुटियन) द्वारा राजनीतिक नेतृत्व के तथाकथित रूप से खिंचाई करने के तौर-तरीकों को भी उजागर किया है। इस संदर्भ में, अशोक गहलोत द्वारा की टिप्पणी-  “कोई अच्छा इंगलिश-हिंदी बोलता है, अच्छी बाइट देता है, वही सब-कुछ नहीं होता है” (Speaking well in English-Hindi, giving good bytes is not everything); पर जिस प्रकार से ANI द्वारा अपने ट्वीट में “हिंदी” शब्द का उड़ा दिया जाना और दिल्ली मिडिया द्वारा इस वक्तव्य को पूर्व पीसीसी प्रमुख के खिलाफ कथित तौर पर प्रसारित करने की कोशिश करना, मीडिया की नियत पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह लगता है।


मिडिया के विपरीत, सोशल मीडिया पोस्ट पर राजस्थान राजनीतिक संकट पर टिप्पणियों से पता चलता है कि कैसे दिल्ली मीडिया जमीनी स्थिति के बारे में अस्पष्ट था और झूठ प्रसारित करने में लगा रहा। दिल्ली मीडिया के एक वर्ग द्वारा निर्मित एक ऐसी झूठी कहानी थी कि सचिन पायलट को उनकी मेहनत के लिए 'प्रतिफल ' नहीं मिल रहा था। हमारे समय की ध्रुवीकृत राजनीति और "भारत के विचार" (Idea of India) पर लगातार हो रहे दक्षिणपंथी हमलों के दौर में, एक कांग्रेसी के सामने यह एक अग्निपरीक्षा का समय है, कि वो "भारत के विचार" (Idea of India) व हमारे राष्ट्रवादी पूर्वजों के विचार के प्रति निष्ठा, संगठन के प्रति प्रतिबद्धता,  लोकतंत्र की रक्षा के लिए साम्प्रदायिक व अराजकतावादी ताकतों के विरूध संघर्ष तथा धर्मनिरपेक्ष समाजवादी विचारधारा के प्रति निष्ठापूर्वक दृढ़ संकल्प के लिए प्रतिबद्ध है। इन सभी आदर्शों का पालन करने के लिए दृढ़ निश्चय व कड़ी मेहनत के साथ किसी भी प्रकार की सौदेबाजी नहीं की जा सकती है।  मैं 1992 में NSUI की सदस्य बनी और राजस्थान के एक छोटे से शहर में छात्र संघ अध्यक्ष (1995) के पद पर निर्वाचित हुई। मेरे माता-पिता सिर्फ साधारण सरकारी कर्मचारी थे और कई रिश्तेदारों ने मुझे राजनीति में न जाने की सलाह दी। हालाँकि, पहले एनएसयूआई के समर्थन और फिर भारतीय युवा कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान श्री राहुल गांधी के निर्देशन में, मेरे व्यक्तित्व का कांग्रेस के एक निष्ठावान सिपाही और "भारत के विचार", जिसे भाजपा को नष्ट करने के लिए तुली हुई है, के रक्षक के रूप में  निर्माण व विकास हुआ। मैंने अपने युवा जीवन के 28 वर्ष कांग्रेस संगठन को निष्ठापूर्वक दिए हैं। इस प्रकार से देखा जाये तो मैं सचिन पायलट से 12 वर्ष पूर्व कांग्रेस में शामिल हुई थी। कई अवसरों पर, मैंने विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की है और अभी भी एक मौका पाने के लिए प्रयासरत हूं। वर्तमान परिस्थिति में लोग कहेंगे कि मैं एक अव्यावहारिक व्यक्ति हूं, जिसने अपने जीवन के 28 साल संगठन को दिए और टिकट के लिए अनदेखी किए जाने पर बाहर नहीं निकली। हालाँकि, मैं कहूँगी  कि मैंने अपनी राजनीति को केवल एक विधायक / सांसद या मुख्यमंत्री के पद तक सीमित नहीं किया है। इसलिए जो लोग पहले क्षण में जहाज से बाहर कूदते हैं, वे हमेशा जहाज में इसीलिए रहते हैं क्योंकि यह उनके लिए एक सुरक्षित स्वर्ग था।


मै कांग्रेस पार्टी के हजारों अन्य कार्यकर्ताओं की तरह हूँ, जिन्हे शायद सबसे युवा सांसद, युवा पीसीसी प्रमुख और राजस्थान के सबसे युवा डिप्टी सीएम बनने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने कॉलेज, जिला, राज्य स्तर पर मेरी मेहनत को पहचाना और मुझे एनएसयूआई (2003-2005) के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष बनने का मौका दिया, और फिर भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव पद पर पदोन्नत किया (2005-10)। अतः सचिन पायलट को 26 साल की उम्र में जब सांसद का टिकट मिला, तब हम जैसे कार्यकर्ता लगभग एक दशक से NSUI / IYC में अपने कौशल का लाभ दे रहे थे। वर्तमान में, मैं अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की पदाधिकारी हूं।


"युवा तुर्क" के लिए तर्क करने वालों को यह समझना चाहिए कि अशोक गहलोत उत्तर भारत के उन चंद राजनेताओं में से हैं जो मोदी-अमित शाह की जोड़ी का राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला कर सकते हैं। मैं यह मात्र इसलिए नहीं कह रही हूं क्योंकि अशोक गहलोत बहुत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं, या इसलिए कि उनके पास 40 वर्षों का संगठनात्मक कार्य अनुभव है या उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया है, बल्कि यह जनता के बीच उनकी लोकप्रियता उनके लोगों के प्रति प्रेम और स्वच्छ छवि का प्रतिफल है। गुजरात से लेकर कर्नाटक तक उन्होंने मोदी और अमित शाह का मुकाबला किया। वर्तमान में राजस्थान सरकार पर आये राजनीतिक संकट में, जहां बीजेपी ने धन और बाहुबल का इस्तेमाल कर राज्य सरकार को लगभग पछाड़ दिया था, वहां गहलोत का अंगद की भांति दृढ़ता से ठीके रहना, फिर से साबित करता है कि वह राजनीति के जादूगर है और प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष ताकतों को उसके सक्रीय साथ की अत्यंत आवश्यकता है।



जहां तक सचिन पायलट के सत्य (सत्य परेशान होने का कारण) के बारे में मेरा कहना है कि एक चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का आपका हालिया प्रयास केवल भाजपा के "कांग्रेस मुक्त भारत’ के एजेंडे में मदद करने वाला है। ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ क्या है? यह सिर्फ राजस्थान / कर्नाटक / मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस या कांग्रेस सरकार का सफाया करने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को 'विप्रक्ष-मुक्त भारत' बनाने के लिए एक घृणित षड्यंत्र है। जब श्री राहुल गांधीजी भाजपा के फासीवादी, विभाजनकारी एजेंडे के खिलाफ लगातार लड़ते आ रहे है, ऐसे में वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता उनके विरोधियों को ही मजबूत करती है। एक स्वस्थ, सुव्यवस्थित लोकतंत्र को एक जीवंत, तेज, ईमानदार और सशक्त विपक्ष की आवश्यकता है। राजनीति में, नेताओं और पार्टी के कार्यकर्ताओं की राय में, नीतियों पर बहस और अपनी सरकार के लिए महत्वपूर्ण मतभेद हो सकते हैं। हालांकि, पार्टी संगठनों में इस तरह के मतभेदों को सुलझाने के लिए एक अच्छी तरह से स्थापित तंत्र मौजूद होना चाहिए और केंद्रीय नेतृत्व ने हमेशा बातचीत द्वारा मतभेदों के समाधान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में कहीं भी यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि कोई एक सार्वजनिक जनादेश को अपमानित करके उसे राजनीति का नाम देने की कोशिश करे। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि सचिन पायलेट ने मेहनत की, परन्तु तथ्य यह भी है कि अशोक गहलोत ने भी नीचे से ऊपर तक सभी पायदानों पर वर्षो पार्टी की सेवा की है, उनके अर्जित अनुभवों तथा शक्ति की कांग्रेस को आज भी आवश्यकता है और आज अधिकांश विधायक उनके नेतृत्व में अपना विश्वास रखते हैं। ऐसे में उनको हटाने की बात अतार्किक ही नहीं अनैतिक भी है। अतः, वे न केवल अपने 'राज धर्म' का पालन कर रहे हैं, बल्कि 'जन धर्म' का भी निर्वहन कर रहे हैं, जो लोकतांत्रिक राजनीति की प्रक्रिया को सुदृढ़ बनता है। एक विधायक के रूप में सचिन आपका पहला कर्तव्य लोकतंत्र की रक्षा करना, मतभेदों को बढ़ावा देना, चर्चा और बहस को प्रोत्साहित करना है। परन्तु आपने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को अस्थिर करने के प्रयास करके संविधान की नैतिकता का पालन नहीं किया है। क्योंकि  वर्तमान राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में यह लड़ाई किसी व्यक्ति या मंत्री पद या कांग्रेस पार्टी के बारे में नहीं है। बल्कि यह गांधी के राष्ट्र में लोकतांत्रिक राजनीति की उपजाऊ मिट्टी की रक्षा, संरक्षण और पोषण करने की लड़ाई है।


Published on 19th July Opinion : बिना वजह बगावत ! -

 http://indianlooknews.com/opinion/opinion-rebels-without-reason-article-by-chaynika-uniyal-panda/

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