Tuesday, April 24, 2007

एक पथिक कि अभिलाषा

तेरे प्यार कि छाँव मे कुछ वक्त गुजर जाने दे-
टूटे हुये ख्वाबों कि तकदीर संवार जाने दे-
अहसान इतना मुझ पे कर दे तू मेरे हमदम-
जीवन के अंधेरों को कुछ देर निखर जाने दे !!

मैं तो एक पथिक हूँ कहीँ दूर निकल जाऊंगी-
होते ही शाम कहीँ अंधेरों मे जल जाऊंगी-
कुछ देर लगा रहने दे सहाने से ओर सर को -
पलकों मे आये हुये अश्कों को बिखर जाने दे!!

फिर सुबह नसीब होगी कहॉ किस मुकाम पर-
कुछ खबर नही अँधेरे ले जाएँ किस अंजाम पर-
आज तेरे पहलू मे दो घड़ी का साथ है-
आज हर जख्म को सीने पर उतर जाने दे!!

बुझाते हुये शोलों को दामन से हवा दे दे-
फिर गुजरे ज़माने को एक बार सदा दे दे-
भटक जाऊं ना किसी हसीन याद कि गली-
बस आज चांद लम्हों के लिए वक्त ठहर जाने दे!!

1 comment:

अतुल said...

वाह! बहुत बढ़िया. मैं तो वैसे हूं बिहार का पर एम. ए. किया है आपके ही पास लाडनूं से. देखा तो याद आ गयी. अपने बारे में और बताईए.
धन्यवाद