Tuesday, April 24, 2007

अछूत

देश हेतु मरते जो है-
हिंदु जाती के सच्चे सपूत!
हां! हम स्वार्थी मानव-
उन्हें समखाते नीच अछूत!!
तब तक होगा नहीं हमारे-
बंधु अछूतों का उद्धार!
जब तक मैल विकार हटाकर-
नहीं करेंगें उनसे प्यार!!
तब तक मन मे बसा रहेगा-
छुआचुत का तुच्छ विचार!
एकसूत्र जब तक सबका-
नहीं गुन्थेगा निर्मल हार!!
जन उन्नति कि आशा करना-
तब तक जग मे है निर्मूल!
बंधु बंधु से करे घृणा-
देखो कैसी है ये भूल!
मिलो उन्हें सब गले लगाकर-
करो उन्हें तुम दिल से प्यार!
देश उन्नति जो आप चाहते-
छोरो ऐसा दुर्व्यवहार!!

दादाजी द्वारा सन 1936 मे रचयित
(स्वर्गीय श्री ललिता प्रसाद उनियाल 'ललाम' , व्याख्याता डी ए व कालेज लाहौर)

1 comment:

Sanjeet Tripathi said...

सुंदर रचना जो कि आज भी प्रासंगिक है।
रचनाकार को मेरा नमन व श्रद्धांजलि!