Wednesday, September 12, 2007

विद्यार्थी ओर राजनीति

समय समय पर विद्यार्थियों के द्वारा राजनीति मे हिस्सेदारी को ले कर समाज के प्रबुद्ध एवं वरिष्ठ लोगों द्वारा प्रश्न उठाये जाते रहे है। उनका तर्क रहा है कि विद्यार्थी जिनका कि मूल उद्देश्य विद्या अध्यन करना है, यदि राजनीति मे सक्रीय रूप से भाग लेते है, तो क्या वे अपने मूल उद्देश्य से भटक नहीं जायेंगे? ओर क्या यह कार्य उनके भविष्य निर्माण मे बाधक नहीं होगा?

यह सही है कि विद्यार्थियों का मुख्य उद्देश्य पढाई करना है। उन्हें अपना पुरा ध्यान उस ओर लगाना चाहिऐ, लेकिन राष्ट्रिय परिस्तिथियों का ज्ञान ओर उसके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना भी शिक्षा मे शामिल होना चाहिऐ, ताकी वे राष्ट्रिय समस्याओं के समाधान मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके। क्यूंकि ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो विद्यार्थियों को देश की संरचना निमार्ण मे कोई भागीदारी नहीं देती- उन्हें व्यवहारिक रूप से अकर्मण्य बनाती है। उसे हम पूर्णत: सार्थक नहीं कह सकते है। वैसे भी एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र मे प्रत्येक नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति तथा राष्ट्रिय कार्यप्रणाली मेँ भागीदारी निभाता है ओर ऐसे मेँ राजीव गांधी द्वारा प्रदत्त १८ वर्ष के व्यस्क मताधिकार से छात्रों की भागीदारी तो स्वत: ही स्पष्ट हो जाती है।

अत: उपरोक्त परिस्तिथियों मे राष्ट्रिय नेतृत्व का दायित्व है की वे छात्रों मे, जिन्हे कल देश की बागडोर हर स्तर पर अपने हाथों मे लेनी है- नेतृत्व क्षमता पैदा करें, उन्हें उनके राष्ट्रिय कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक बनायें, उन्हें सांप्रदायिक व प्रथक्तावादी ताकतों के विरुद्ध एकजुट करें, उन्हें लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली से अवगत कराएँ ओर साथ ही राष्ट्रिय समस्याओं के समाधान मे उनकी भागीदारी सुनिश्चित करें। यदि वे ऐसा नहीं करते है तो वे ना सिर्फ राष्ट्र के साथ विश्वासघात करेंगे, बल्कि यह देश की भावी पीढी के साथ भी घोर अन्याय होगा। क्योंकी ऐसा ना करने पर भारतवर्ष मे एक ऐसी नेतृत्व शून्यता पैदा होगी जो देश को अनजाने अंधकारमय भविष्य की ओर धकेल देगी।

इसके अतिरिक्त छात्रों को भी चाहिऐ की वे पढे, जरुर पढे, परंतु साथ ही राष्ट्रिय गतिविधियों मे भी सक्रीय भागीदारी निभाए ओर अधिकार तथा जिम्मेदारियों को समझते हुये राष्ट्रिय परिपेक्ष्य मे जब, जहाँ, जितनी आवश्यकता हो अपना संपूर्ण योगदान दे। ऐसा करने पर ही वो भारतवर्ष को उन्नति के चरमोत्कर्ष ले जा सकने मे सफल हो सकेंगे तथा उस राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे जो नेहरू गांधी के सपनो का राष्ट्र था।

3 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया लिखा है आपने!
परंतु कौन सा राजनैतिक संगठन इन किताबी बातों को अपने छात्र या युवा विंग पर लागू करता है।

दिल्ली विवि के चुनावों में विजयी एक बंदा एक टी वी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में साफ़ साफ़ कहता है कि उसने टिकट के लिए लाखों खर्च किए है और विजयी होने के लिए और भी लाखों!!

जो बातें आपने इस लेख में लिखी है वह बातें क्या कांग्रेस और भाजपा दोनो दलों के छात्र-युवा विंग में कहीं नज़र आती है?

भाजयुमो हो या युवा कांग्रेस, एन एस यू आई हो या ए बी वी पी, सबके अधिकतर कार्यकर्ता जहां उंचे पद पर पहुंचे नही कि पहुंच जाते है सरकारी कार्यालयों में चंदा लेने, ठेका लेने। जिसने नही दिया उसके खिलाफ़ आरोप लगाकर तोड़फ़ोड़!!

इन हालातों को देखकर तो यही लगता है कि कैंपस से राजनीति को बिलकुल ही दूर रखा जाए कम से कम कैंपस में पढ़ाई तो हो सही से!!

amit tiwari said...

I must say that I fall into total concordance with gentleman commenting just above me. In the context of fraudulent business of student politics (which appears in India only, correct me if I am wrong), it necessitates for the learner to learn such acts which would rather make him/her cunning instead of wiser. The Gandhian excuse of bringing students into politics must have been ended with the independence;but it never happened.
I find the blogger totally incorrect when she names Rajiv Gandhi's act of granting universal adult franchise to eighteen years olds as to encourage student politics. The blogger may differ on this.
Apart from this, no educational institutions who are actually providing the blanket of respect for this country in form of their scholars winning name all over the world, never dared encourage politics within their premises. I suppose if the blogger is correct about pushing India into dark ages if student politics is not encouraged then these institutions definitely are doing blasphemies. I am sure when I say that IIT,AIIMS & IIM do not conduct student elections. How fool they are ? isn't it ? I ,at least, hereby agree with fuhrer who pens in 'mein kampf' about entrance age into politics i.e. 25.
All this hugger-mugger ideologies looks good on paper (just like Indian cricket team), when in practice they result in murder of Prof. Sabharwals.

My apologies for commenting in English as I am not available with the option of commenting in Hindi.

Neeraj नीरज نیرج said...

बधाई .. हिन्दी लेखन पर..

छात्रों को राजनीति से क्या लेना-देना? कॉलेज में सियासी पार्टियां युवा शक्ति को मोहरे बनाकर उनका दुरूपयोग करती हैं. यही से भ्रष्ट राजनीति की क ख ग उन्हें सिखायी जाती है. मेरा निजी अनुभव यह है कि कॉलेज स्कूलों की राजनीति से छात्रों में आपसी दुराग्रह, अशांति और अगंभीरता बढ़ती है. जिन्हें राजनीति करनी है. समाज सुधार करना है. भूख, भय और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ना है उनको तुरंत पार्टी ज्वाइन करनी चाहिए. ये छात्र मंच दिखावा है. सियासी दलो के लॉलीपॉप हैं जो युवाओं को दिए जाते हैं. इस लॉलीपॉप को चूसकर वह मुख्यधारा की राजनीति में जनता का ख़ून चूसने की ट्रेनिंग ले लेता है. बाक़ी व्यवहारिक बातें ऊपर संजीत ने दे ही दिए हैं.

इन सबके बावजूद मैं आपका हार्दिक स्वागत करता हूं हिन्दी लेखन पर. हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएं.